भाद्रपद मास · घर का उत्सव
विनायक चतुर्थी
श्री वरसिद्धि विनायक · लगभग 60 मिनट · 17 चरण
कब है?
- हमारे ऐप की तिथि
- टीटीडी पंचांग
विधि — एक नज़र में
तिथियाँ हमारे अपने पंचांग इंजन की गणना हैं — टीटीडी श्रीवारी कैलेंडर से मिनट-दर-मिनट मेल खाती हैं। इस विधि को हमारे गुरुजी ने देखा है।
यह घर भर के मिलकर करने की त्योहार-पूजा है। पुरोहित न हों तो भी चिंता नहीं — हर सीढ़ी पर यह विधि आपके साथ चलेगी। क्या करना है, अपनी भाषा में बताएगी; मंत्र आपकी अपनी लिपि में दिखेंगे। सब कुछ जुट ही जाए, ज़रूरी नहीं — जो है उसी में भक्ति से करें, स्वामी के लिए वही उत्सव है।
पूजा का उत्तम समय सुबह स्नान के बाद, दोपहर से पहले। पूरी पूजा में लगभग एक घंटा; व्रत कथा मिलाकर डेढ़ घंटा मान लीजिए। उद्वासन केवल विसर्जन के दिन।
पूरी विधि
पूजा की तैयारी
- पूजा का स्थान साफ़ करके, चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाइए।
- प्राकृतिक मिट्टी से बने गणपति को चौकी पर रखकर, फूलों, पत्तों या दोबारा उपयोग में आने वाली सजावट से सजाइए।
- पूजा की सारी सामग्री — फूल, दूर्वा, पत्र, फल, नैवेद्य — सब पास ही तैयार रखिए।
- 🌿 प्रकृति सुझाव: प्लास्टिक के फूल, थर्मोकोल और चमकीली सजावट के बदले प्राकृतिक या दोबारा उपयोग होने वाली सजावट चुनिए।
सामग्री एक बार देख लीजिए
- पूजा में उतरने से पहले एक बार देख लीजिए — नित्य पूजा का सामान और चेकलिस्ट की चीज़ें, सब या जितनी संभव हुईं, तैयार हैं न?
- एक बार देख लेना चाहें तो नीचे चेकलिस्ट बटन दबाइए; ज़रूरत न लगे तो आगे बढ़ते हैं।
दीपक जलाएँ
- पूजा स्थल पर दीपक जलाएँ।
श्लोकशुभं करोति कळ्याणं आरोग्यं धनसंपदः । शत्रुबुद्धि विनाशाय दीपज्योति नमोस्तुते ॥
आचमन
- दाहिने हाथ में थोड़ा जल लेकर, हर मंत्र के बाद थोड़ा जल ग्रहण कीजिए।
श्लोकओं केशवाय स्वाहा । ओं नारायणाय स्वाहा । ओं माधवाय स्वाहा ।
संकल्प
- हाथ में थोड़े अक्षत और जल लेकर श्रद्धा से संकल्प कीजिए:
- “आज श्री विनायक चतुर्थी के अवसर पर, अपने परिवार के क्षेम, आरोग्य, शांति और शुभ के लिए मैं श्री विनायक स्वामी की भक्तिपूर्वक पूजा कर रहा/रही हूँ।”
- फिर अक्षत पूजा की थाली में छोड़ दीजिए।
आवाहन
- विनायक को श्रद्धा से आमंत्रित करते हुए फूल या अक्षत अर्पित कीजिए।
श्लोकओं गं गणपतये नमः । आवाहयामि ॥
वस्त्र
- यदि विनायक के लिए छोटा वस्त्र हो तो पहनाइए।
- न हो तो स्वच्छ नया वस्त्र स्वामी के सामने अर्पित कीजिए।
श्लोकओं श्री गणेशाय नमः । वस्त्रं समर्पयामि ॥
चंदन • हल्दी • कुमकुम
- विनायक को चंदन अर्पित कीजिए।
- फिर हल्दी और कुमकुम अर्पित कीजिए।
श्लोकओं श्री गणेशाय नमः । गंधं समर्पयामि ॥
यज्ञोपवीत
- विनायक को यज्ञोपवीत अर्पित कीजिए। इसे उनके बाएँ कंधे से दाहिनी ओर उतरते हुए पहनाइए।
- मूर्ति को पहना सकें तो पहनाइए। न हो सके तो स्वामी के सामने अर्पित कीजिए।
श्लोकओं श्री गणेशाय नमः । यज्ञोपवीतं समर्पयामि ॥
दूर्वा या गरिका
- स्वच्छ दूर्वा को विनायक को श्रद्धा से अर्पित कीजिए।
श्लोकओं गं गणपतये नमः । दूर्वांकुरान् समर्पयामि ॥
21 पत्र पूजा
- विनायक चतुर्थी में इक्कीस प्रकार के पत्रों से पूजा करने की परंपरा है।
- सभी इक्कीस प्रकार न मिलें तो भी, इक्कीस दूर्वा से श्रद्धापूर्वक पूजा जारी रखी जा सकती है।
श्लोकओं सुमुखाय नमः । माचीपत्रं पूजयामि ॥ ओं गणाधिपाय नमः । बृहतीपत्रं पूजयामि ॥ ओं उमापुत्राय नमः । बिल्वपत्रं पूजयामि ॥ ओं गजाननाय नमः । दूर्वायुग्मं पूजयामि ॥ ओं हरसूनवे नमः । दत्तूरपत्रं पूजयामि ॥ ओं लंबोदराय नमः । बदरीपत्रं पूजयामि ॥ ओं गुहाग्रजाय नमः । अपामार्गपत्रं पूजयामि ॥ ओं गजकर्णाय नमः । तुलसीपत्रं पूजयामि ॥ ओं एकदंताय नमः । चूतपत्रं पूजयामि ॥ ओं विकटाय नमः । करवीरपत्रं पूजयामि ॥ ओं भिन्नदंताय नमः । विष्णुक्रांतपत्रं पूजयामि ॥ ओं वटवे नमः । दाडिमीपत्रं पूजयामि ॥ ओं सर्वेश्वराय नमः । देवदारुपत्रं पूजयामि ॥ ओं फालचंद्राय नमः । मरुवकपत्रं पूजयामि ॥ ओं हेरंबाय नमः । सिंधुवारपत्रं पूजयामि ॥ ओं शूर्पकर्णाय नमः । जातीपत्रं पूजयामि ॥ ओं सुराग्रजाय नमः । गंडकीपत्रं पूजयामि ॥ ओं इभवक्त्राय नमः । शमीपत्रं पूजयामि ॥ ओं विनायकाय नमः । अश्वत्थपत्रं पूजयामि ॥ ओं सुरसेविताय नमः । अर्जुनपत्रं पूजयामि ॥ ओं कपिलाय नमः । अर्कपत्रं पूजयामि ॥ ओं श्री गणेश्वराय नमः । एकविंशति पत्राणि पूजयामि ॥
श्री विनायक अष्टोत्तर
- श्री विनायक के एक सौ आठ नामों को पढ़ते हुए, हर नाम पर फूल या अक्षत अर्पित कीजिए।
नैवेद्य
- जो नैवेद्य आपसे बन पड़े, वही विनायक को अर्पित कीजिए।
- फिर थोड़ा जल अर्पित कीजिए।
श्लोकओं गं गणपतये नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ॥
विनायक चतुर्थी व्रत कथा (विनायक का जन्म)
- व्रत कथा सुनने से पहले हाथ में थोड़े अक्षत रख लीजिए। कथा पूरी होने पर उन्हें सिर पर रखिए।
- ⏩ कथा धीमी लगे तो नीचे ×1 बटन से गति बढ़ा सकते हैं।
- व्रत के लिए श्यमंतकोपाख्यान ही पर्याप्त है — यह जन्म कथा उनकी महिमा के लिए। समय कम हो तो यह भाग छोड़ सकते हैं।
विनायक चतुर्थी व्रत कथा (श्यमंतकोपाख्यान)
- व्रत कथा सुनने से पहले हाथ में थोड़े अक्षत रख लीजिए। कथा पूरी होने पर उन्हें सिर पर रखिए।
- ⏩ कथा धीमी लगे तो नीचे ×1 बटन से गति बढ़ा सकते हैं।
- अब श्यमंतकोपाख्यान पढ़िए या सुनिए — व्रत की मुख्य कथा यही है।
- यही व्रत की मुख्य कथा है — इसे सुनना/पढ़ना अनिवार्य है। हाथ में अक्षत रखकर सुनिए; कथा के बाद सिर पर रख लीजिए।
प्रार्थना
- हाथ जोड़कर विनायक से प्रार्थना कीजिए।
- फिर अपने परिवार, आरोग्य, पढ़ाई, काम या अपनी इच्छाओं को अपने ही शब्दों में विनायक से कहिए। ❤️
- उसके बाद केवल अपने लिए नहीं, संसार के कल्याण के लिए भी निःस्वार्थ भाव से प्रार्थना कीजिए।
श्लोकतत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि । तन्नो दंतिः प्रचोदयात् ॥ सर्वे जनाः सुखिनो भवंतु ॥
आरती
- दीप या कर्पूर से विनायक को आरती दीजिए।
- आरती लेकर प्रणाम कीजिए।
श्लोकओं गं गणपतये नमः । नीराजनं समर्पयामि ॥
उद्वासन व विसर्जन विधि
उद्वासन
- विसर्जन के दिन विनायक को दीप, धूप, फूल और नैवेद्य अर्पित करके आरती दीजिए।
- फिर हाथ जोड़कर प्रेम से इस प्रकार प्रार्थना कीजिए:
- “विनायक… हमारी पूजा स्वीकार कीजिए और हमें आशीर्वाद दीजिए। अब अपने स्थान को लौटिए, और अगले वर्ष फिर हमारे घर आइए।” ❤️
- अक्षत या फूल अर्पित करते हुए यह मंत्र कहिए।
- फिर प्रणाम करके विनायक को विसर्जन के लिए ले जाइए।
पूजा सामग्री — बाद में क्या करें
- 🌺 अपने घर की परंपरा के अनुसार जितने दिन विनायक को रखते हैं, हर दिन दीप, धूप, फूल, नैवेद्य और आरती — सरलता से कर सकते हैं।
- ♻️ फूल, पत्र, दूर्वा — हो सके तो compost कीजिए, या biodegradable wet waste में डालिए।
- 🌊 “प्राकृतिक ही तो है” सोचकर तालाब, नहर या नदी में मत डालिए। फूल और पत्र प्राकृतिक होते हुए भी, बड़ी मात्रा में पानी में सड़ते समय पानी की oxygen घटा देते हैं। इससे मछलियों और जलचरों को साँस लेना कठिन होता है, पानी की गुणवत्ता गिरती है, और फूलों के साथ गया तेल, कुंकुम, रंग और धागा उन्हें और नुकसान पहुँचाते हैं।
- Eco-friendly का अर्थ “प्राकृतिक चीज़ पानी में डालना” नहीं है — बिना नुकसान पहुँचाए उसे फिर मिट्टी में मिला देना है। 🌿
- 🍎 फल, नारियल, नैवेद्य — प्रसाद के रूप में लीजिए और बाँटिए।
- ✨ Decorations — अगली पूजाओं में फिर उपयोग कीजिए।
विसर्जन — Eco-friendly
- 🌿 यदि विनायक सहज मिट्टी के हैं, तो हो सके तो घर में ही बड़े पात्र में विसर्जन कर सकते हैं। विसर्जन के बाद वह जल पौधों को दे सकते हैं।
- 🌊 बाहर विसर्जन करें तो designated eco-friendly immersion ponds का उपयोग कीजिए।
- 🚫 फूल, plastic covers, thermocol और cloth decorations — पानी में मत डालिए।
- ❤️ हमने विनायक को प्रेम से घर बुलाया। फूलों से पूजा की। नैवेद्य अर्पित किया। आरती दी।
- उन्हें विदा कहते समय भी… उनकी सृष्टि को हानि न पहुँचे, इसका ध्यान रखें — यही हमारी पूजा का सबसे सुंदर समापन है। 🌿❤️
- विनायक की पूजा करें। विनायक की सृष्टि का भी सम्मान करें।
- 🙏 गणपति बप्पा मोरया!
पूजा सामग्री सूची
🪔 नित्य पूजा सामग्री
- हल्दी
- कुमकुम
- चंदन
- अक्षत
- दीये के नीचे रखने के लिए प्लेटें
- रुई की बत्तियाँ
- तेल / घी
- कर्पूर
- अगरबत्ती / धूप
- माचिस
- घंटी
- आरती की थाली
- पूजा का जलपात्र
- छोटी कटोरियाँ
- चम्मच
- धागा
- उद्धरिणी
🪷 विनायक और पूजा की चौकी
- प्राकृतिक मिट्टी के विनायक
- पूजा की चौकी
- चौकी पर बिछाने के लिए स्वच्छ वस्त्र
- विनायक के लिए छोटा वस्त्र
- यज्ञोपवीत
- पालवेल्लिवैकल्पिक
🌺 फूल • पत्र • फल और ताम्बूल
- फूल
- फूलों की मालावैकल्पिक
- दूर्वा
- इक्कीस प्रकार के पत्रवैकल्पिक
- आम के पत्ते / तोरणवैकल्पिक
- केले
- जो अन्य फल आपको उपलब्ध होंवैकल्पिक
- नारियल
- पान के पत्ते
- सुपारी
🍚 नैवेद्य के लिए
- उंड्राळ्ळुवैकल्पिक
- कुडुमुलु / मोदकवैकल्पिक
- गुड़वैकल्पिक
- पायसम्वैकल्पिक
- पानकम्वैकल्पिक
- चलिमिडि, वडपप्पुवैकल्पिक
- घर में बना अन्य प्रसादवैकल्पिक
🌿 एकविंशति पत्र
- माचीपत्रीवैकल्पिक
- वाकुडु पत्ता (बृहती)वैकल्पिक
- बेल (बिल्व)वैकल्पिक
- दूर्वा (दूब)वैकल्पिक
- धतूरावैकल्पिक
- बेर (बदरी)वैकल्पिक
- अपामार्ग (चिरचिटा)वैकल्पिक
- तुलसीवैकल्पिक
- आम (चूत)वैकल्पिक
- कनेर (करवीर)वैकल्पिक
- विष्णुक्रांतावैकल्पिक
- अनार (दाडिमी)वैकल्पिक
- देवदारुवैकल्पिक
- मरुआ (मरुवक)वैकल्पिक
- निर्गुंडी (सिंदुवार)वैकल्पिक
- चमेली (जाती)वैकल्पिक
- कचनार (गंडकी)वैकल्पिक
- शमीवैकल्पिक
- पीपल (अश्वत्थ)वैकल्पिक
- अर्जुनवैकल्पिक
- आक (अर्क)वैकल्पिक
प्रसादम्
उंड्राळ्ळु, कुडुमुलु / मोदक
विनायक चतुर्थी के नैवेद्य में सबसे पहले यही याद आते हैं।
पायसम्, पानकम्, चलिमिडि, वडपप्पु
इनमें से जो आपसे बन पड़े, उतना ही पर्याप्त है।
गुड़, घर में बना अन्य प्रसाद
जो नैवेद्य आपसे बन पड़े, वही विनायक को अर्पित कीजिए।
📖 व्रत कथा — विनायक का जन्म
🌿 सूत महर्षि द्वारा कही गई विनायक व्रत की महिमा
पुराने समय में धर्मराज अपना राज्य और सारी संपत्ति खोकर, द्रौपदी और अपने भाइयों के साथ वनवास कर रहे थे। एक दिन वे नैमिषारण्य पहुँचे।
वहाँ शौनकादि महर्षियों को अनेक पुराण-रहस्य समझा रहे सूत महर्षि के दर्शन करके उन्होंने प्रणाम किया।
“महर्षि… हमने राज्य और संपत्ति सब कुछ खो दिया है। ये कष्ट दूर होकर फिर से पुराना वैभव मिले, ऐसा कोई व्रत हो तो बताइए” — ऐसी प्रार्थना की।
तब सूत महर्षि ने धर्मराज को श्री विनायक व्रत की महिमा बताना आरंभ किया।
🐘 गजासुर की तपस्या — शिवजी का दिया हुआ वरदान
पुराने समय में गजासुर नाम का एक राक्षस था। उसने परमशिव के लिए बहुत ही कठोर तपस्या की।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए और बोले, “गजासुर… तुम्हें जो वरदान चाहिए, माँग लो।”
गजासुर ने शिवजी को प्रणाम करके माँगा, “स्वामी… आप सदा मेरे उदर में ही निवास कीजिए।”
भक्त की इच्छा को टाल न सकने के कारण शिवजी गजासुर के उदर में प्रवेश कर गए।
❤️ शिवजी को वापस लाने के लिए श्रीहरि ने सोचा उपाय
कैलास में पार्वती देवी को पता ही नहीं चला कि शिवजी कहाँ हैं। कितना भी ढूँढा, वे दिखाई न दिए।
अंत में उन्हें ज्ञात हुआ कि शिवजी गजासुर के उदर में हैं। उन्हें बाहर कैसे लाया जाए, यह न सूझने पर उन्होंने श्रीमहाविष्णु से प्रार्थना की।
विष्णुमूर्ति ने पार्वती देवी को अभय देकर ब्रह्मा आदि देवताओं को बुलाया। तब एक उपाय सोचा गया।
शिवजी के वाहन नंदी को सजे हुए बैल (गंगिरेद्दु) के रूप में सजाया गया। ब्रह्मा आदि देवताओं ने वाद्य सँभाले।
श्रीमहाविष्णु स्वयं उस बैल-मंडली को चलाने वाले बन गए, और सब मिलकर गजासुर के राज्य में गए।
गजासुर के सामने नंदी को बहुत ही अद्भुत ढंग से नचाया गया। वह प्रदर्शन देखकर गजासुर बहुत प्रसन्न हुआ और बोला, “आपको जो चाहिए माँग लीजिए। मैं दूँगा।”
तब श्रीहरि ने कहा, “यह बैल साधारण नहीं है। यह शिवजी का वाहन नंदी है। अपने स्वामी को ढूँढ़ता हुआ आया है। शिवजी को वापस दे दो।”
उस बात से गजासुर समझ गया कि उसके सामने श्रीमहाविष्णु हैं। उसने जान लिया कि अब मृत्यु निश्चित है।
तब अपने उदर में विराजमान शिवजी से प्रार्थना करते हुए उसने माँगा, “स्वामी… मेरा शिर तीनों लोकों में पूजा जाए। मेरा चर्म आप धारण करें।”
शिवजी ने वह वरदान दे दिया। नंदी ने अपने सींगों से गजासुर का उदर चीर दिया और शिवजी बाहर आ गए। इसके बाद शिवजी कैलास की ओर चल पड़े।
🌺 पार्वती देवी के बनाए बालक का गजानन बनना
शिवजी लौट रहे हैं, यह जानकर पार्वती देवी बहुत प्रसन्न हुईं।
स्नान की तैयारी करते हुए, अपने शरीर पर लगाए उबटन से उन्होंने एक छोटे बालक का रूप बनाया और अपनी शक्ति से उसमें प्राण डाल दिए।
उस बालक को द्वार पर खड़ा करके कहा, “जब तक मैं न कहूँ, किसी को भीतर मत आने देना।”
माँ के कहे अनुसार बालक वहीं पहरा देता खड़ा रहा।
इतने में शिवजी कैलास पहुँचे। भीतर जाने लगे तो उस बालक ने रोक दिया।
उसके सामने कौन है, यह बालक को पता नहीं था। उसे बस एक ही बात मालूम थी — माँ की कही बात का पालन करना है।
शिवजी ने कितना ही कहा, उसने रास्ता नहीं दिया। क्रोध के आवेश में शिवजी ने अपने त्रिशूल से बालक का शिर काट दिया और भीतर चले गए।
थोड़ी देर बाद पार्वती देवी से बात करते हुए उस बालक की बात निकली। जो हुआ, वह जानकर पार्वती देवी अत्यंत दुःखी हुईं।
शिवजी को गजासुर को दिया अपना वरदान याद आया। गजासुर का शिर लाकर उस बालक के शरीर पर लगाया और फिर से प्राण डाल दिए।
इस प्रकार वह बालक गजानन बन गया। ❤️
पार्वती-परमेश्वर ने उसे अपने पुत्र के रूप में बड़े प्रेम से पाला। गजानन ने अनिंद्य नाम के मूषक को अपना वाहन बनाया।
इसके बाद पार्वती-परमेश्वर के यहाँ कुमारस्वामी का जन्म हुआ।
👑 गजानन विघ्नाधिपति कैसे बने?
एक दिन देवता और मुनि शिवजी के पास आकर बोले, “विघ्नों के लिए एक अधिपति नियुक्त कीजिए।”
उस पद की इच्छा गजानन और कुमारस्वामी — दोनों ने की।
तब शिवजी ने एक परीक्षा रखी। उन्होंने कहा, “तुममें से जो तीनों लोकों की सभी पुण्य नदियों में स्नान करके पहले मेरे पास आएगा, वही विघ्नों का अधिपति होगा।”
कुमारस्वामी तुरंत अपने मयूर वाहन पर निकल पड़े।
गजानन ने पिता को प्रणाम करके पूछा, “पिताजी… मैं इतनी शीघ्रता से सभी नदियों तक कैसे जा सकूँगा? मुझे कोई मार्ग बताइए।”
तब शिवजी ने उन्हें नारायण मंत्र की महिमा समझाकर मंत्रोपदेश दिया। गजानन ने भक्ति से उस मंत्र का जप किया।
अद्भुत हुआ। कुमारस्वामी जिस भी पुण्य नदी पर पहुँचे… उनसे पहले ही वहाँ गजानन दर्शन देते रहे।
अंत में कुमारस्वामी जब कैलास लौटे, तब गजानन पहले से ही शिवजी के पास थे।
अपने बड़े भाई की महिमा समझकर कुमारस्वामी ने प्रणाम करते हुए कहा, “इस अधिपत्य के योग्य अन्नय्या ही हैं।”
इस प्रकार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन गजानन विघ्नाधिपति बने। तब से वे विघ्नेश्वर कहलाए। ❤️
🌙 चंद्रमा की हँसी — पार्वती देवी का शाप
विघ्नाधिपत्य मिलने के आनंद में देवताओं और भक्तों ने विनायक को बहुत सारे कुडुमुलु, उंड्राळ्ळु, फल, पानकम् और वडपप्पु जैसे नैवेद्य अर्पित किए।
विनायक ने प्रसन्नता से उन्हें स्वीकार किया। कुछ खाए… कुछ अपने मूषक वाहन को दिए… और कुछ हाथ में लेकर कैलास पहुँचे।
माता-पिता को प्रणाम करने के लिए झुकने लगे। पर भरे हुए पेट के कारण झुकना कठिन हो गया।
उस दृश्य को शिवजी के शिर पर विराजमान चंद्रमा ने देखा और उपहास से हँस पड़ा।
चंद्रमा की दृष्टि पड़ते ही विनायक का उदर फट गया, खाए हुए कुडुमुलु बाहर आ गए… और विनायक ने प्राण त्याग दिए।
अपने पुत्र को उस दशा में देखकर पार्वती देवी ने दुःख से चंद्रमा को शाप दिया। उन्होंने कहा, “तेरी दृष्टि के कारण मेरे पुत्र की यह दशा हुई। अब से जो तुझे देखेगा, उस पर मिथ्या कलंक लगेंगे।”
इसके बाद ब्रह्मदेव अन्य देवताओं के साथ कैलास आए, विनायक को फिर से प्राण देकर, पार्वती देवी से प्रार्थना की कि चंद्रमा को दिया शाप वापस ले लें।
अपना पुत्र फिर जीवित हो गया, इससे पार्वती देवी प्रसन्न हुईं। इसलिए उन्होंने चंद्रमा को दिए शाप की तीव्रता कम कर दी।
उन्होंने कहा, “मेरा पुत्र चंद्रमा की दृष्टि से जिस एक दिन मरा — भाद्रपद मास शुक्ल चतुर्थी के दिन — केवल उसी दिन चंद्रमा को देखने वालों पर यह शाप लगेगा।”
तब से लोग विनायक चतुर्थी के दिन चंद्रमा न देखने की परंपरा निभाने लगे। कुछ समय इसी प्रकार बीता।
💎 श्यमंतकोपाख्यान (मुख्य कथा)
पढ़िए (53)
📖 श्यमंतक मणि की कथा
यादव वंश में सत्राजित और प्रसेन नाम के दो भाई थे।
सत्राजित बड़ी भक्ति से सूर्य भगवान की आराधना करता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्य ने एक दिन उसे श्यमंतक मणि नाम का दिव्य रत्न दिया।
कहते हैं उस मणि में बड़ी शक्ति थी। वह जहाँ रहती, वहाँ संपदा और शुभ होते। हर दिन बहुत-सा सोना भी देती। पर एक नियम था — उसे धारण करने वाले को शुचि और नियम से रहना होता।
एक दिन सत्राजित मणि गले में पहनकर द्वारका की गलियों से आ रहा था, तो उसकी चमक देखकर लोगों ने समझा कि स्वयं सूर्य भगवान आ रहे हैं।
श्रीकृष्ण ने मणि के बारे में जानकर सोचा: “इतनी शक्तिशाली मणि राजा उग्रसेन के पास रहे तो प्रजा और राज्य के काम आएगी।”
पर यह सुनकर सत्राजित ने मणि अपने छोटे भाई प्रसेन को दे दी।
एक दिन प्रसेन श्यमंतक मणि गले में पहनकर शिकार के लिए वन गया।
वहाँ एक सिंह ने उस पर हमला कर उसे मार डाला। फिर उस सिंह को जांबवंत ने मारा। सिंह के पास श्यमंतक मणि देखकर वह उसे अपनी गुफा में ले गया और अपने छोटे बेटे को खेलने के लिए दे दी।
प्रसेन के न लौटने पर सत्राजित चिंतित हुआ। उसके पास की श्यमंतक मणि भी न दिखने पर उसे संदेह हुआ: “मणि के लिए श्रीकृष्ण ने ही प्रसेन को मारा होगा।”
यह बात पूरी द्वारका में फैल गई।
बिना किए अपराध का आरोप आने पर श्रीकृष्ण ने सच जानने का निश्चय किया।
कुछ लोगों को साथ लेकर वे वन गए और प्रसेन का पता खोजा। वहाँ प्रसेन का शरीर मिला — और उसके पास सिंह के पंजों के निशान।
उनके पीछे जाने पर मरा हुआ सिंह मिला। वहाँ से कुछ और पदचिह्न एक गुफा तक गए।
श्रीकृष्ण अकेले उस गुफा में गए।
वहाँ एक छोटा बालक श्यमंतक मणि से खेलता दिखा। पास ही उसकी बड़ी बहन जांबवती भी थी।
तभी जांबवंत आ गया। यह समझकर कि कृष्ण मणि लेने आए हैं, वह उनसे युद्ध करने लगा।
दोनों के बीच इक्कीस दिन तक घोर युद्ध चला।
अंत में जांबवंत को एक बात समझ में आई।
उसने जाना कि इतने दिन उससे लड़ने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं है। जिन प्रभु की उसने श्रीराम के रूप में सेवा की थी, वही अब श्रीकृष्ण बनकर आए हैं — यह जानकर उसने प्रणाम किया।
अपनी भूल की क्षमा माँगते हुए उसने श्यमंतक मणि श्रीकृष्ण को दे दी। पहली ही नज़र में श्रीकृष्ण पर मुग्ध हुई अपनी पुत्री जांबवती का विवाह भी उनके साथ कर दिया।
श्रीकृष्ण श्यमंतक मणि लेकर द्वारका लौटे।
जो हुआ उसका सच जानकर सत्राजित को बहुत दुख हुआ।
बिना कारण श्रीकृष्ण पर आरोप लगाने की क्षमा माँगी। अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। श्यमंतक मणि भी कृष्ण को ही देना चाहा।
पर श्रीकृष्ण ने मणि नहीं ली। “यह तुम्हारी ही है” कहकर सत्राजित को लौटा दी।
कुछ समय बाद, जब श्रीकृष्ण द्वारका में नहीं थे, एक और घटना घटी।
सत्यभामा के विवाह से पहले से असंतुष्ट कुछ लोगों की बातों में आकर शतधन्वा ने सत्राजित का वध कर श्यमंतक मणि ले ली।
फिर वह मणि अक्रूर के पास छिपा दी।
यह जानकर श्रीकृष्ण लौटे, सत्यभामा को सांत्वना दी, और बलराम के साथ शतधन्वा का पीछा किया।
अंत में श्रीकृष्ण ने शतधन्वा को पकड़कर उसका वध किया।
पर कितना भी खोजने पर उसके पास श्यमंतक मणि नहीं मिली।
इससे बलराम को भी संदेह हुआ। “मणि तुम्हें ही मिली है। मुझे बताए बिना छिपा ली होगी,” यह कहकर वे श्रीकृष्ण पर संदेह कर वहाँ से चले गए।
कोई भूल न करने पर भी श्रीकृष्ण पर फिर आरोप आया। ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है? — श्रीकृष्ण ने सोचा।
तब नारद महर्षि ने असली कारण बताया।
🌙 विनायक और चंद्रमा की कथा
यह कथा थी कि विनायक को देखकर हँसने पर चंद्रमा को माता पार्वती का शाप कैसे मिला।
नारद ने श्रीकृष्ण को बताया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखने का क्या फल होता है, और समझाया: “आपने भी उस दिन चंद्रमा देखा होगा। इसीलिए बिना किए अपराधों के भी आप पर एक के बाद एक आरोप आए।”
तब श्रीकृष्ण को याद आया कि उन्होंने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखा था। तुरंत उन्होंने विनायक की प्रार्थना की।
विनायक प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया: श्रीकृष्ण पर आए आरोप दूर हो जाएँगे।
तब श्रीकृष्ण ने एक बात पूछी: “मुझ तक पर ऐसा हो सकता है, तो अनजाने में चंद्रमा देख लेने वाले साधारण लोगों का क्या?”
तब विनायक ने सबको एक वरदान दिया।
वरदान यह था: विनायक चतुर्थी के दिन जाने-अनजाने चंद्रमा देखने वाले यदि विनायक की पूजा कर यह श्यमंतक मणि की कथा सुनें, तो उन पर कोई मिथ्या आरोप नहीं आएगा।
बाद में अक्रूर द्वारका लौटा। श्यमंतक मणि उसी के पास होने का सच सबको पता चला।
इससे श्रीकृष्ण पर आए संदेह पूरी तरह दूर हो गए।
कथा कहती है कि श्यमंतक मणि अक्रूर के पास रहते हुए, उससे आई संपदा को उसने अच्छे कामों में लगाया।
🙏 भूल से चंद्रमा दिख जाए तो कहने का श्लोक
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जांबवता हतः । सुकुमारक मा रोदीः तव ह्येष श्यमंतकः ॥
🙏 अंत में धर्मराज को सूत महर्षि का उपदेश
इतनी कथा सुनाकर सूत महर्षि ने धर्मराज से कहा: “तुम भी भक्ति से श्री विनायक व्रत करो। तुम्हारे विघ्न दूर होंगे, विजय मिलेगी।”
धर्मराज ने विधिपूर्वक विनायक की पूजा कर व्रत किया। समय के साथ अपने कष्टों को पार कर राज्य फिर पाया।
इस तरह विघ्न दूर कर कार्यसिद्धि देने वाला श्री वरसिद्धि विनायक व्रत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है। ❤️
🙏 ॐ गं गणपतये नमः
🙏 श्री वरसिद्धि विनायक स्वामी की जय
श्री विनायक अष्टोत्तर शतनामावली
पूरी नामावली पढ़िए (108)
ओं गजाननाय नमः
ओं गणाध्यक्षाय नमः
ओं विघ्नराजाय नमः
ओं विनायकाय नमः
ओं द्वैमातुराय नमः
ओं द्विमुखाय नमः
ओं प्रमुखाय नमः
ओं सुमुखाय नमः
ओं कृतिने नमः
ओं सुप्रतीपाय नमः
ओं सुखनिधये नमः
ओं सुराध्यक्षाय नमः
ओं सुरारिघ्नाय नमः
ओं महागणपतये नमः
ओं मान्याय नमः
ओं महाकालाय नमः
ओं महाबलाय नमः
ओं हेरंबाय नमः
ओं लंबजठराय नमः
ओं ह्रस्वग्रीवाय नमः
ओं महोदराय नमः
ओं मदोत्कटाय नमः
ओं महावीराय नमः
ओं मंत्रिणे नमः
ओं मंगळस्वराय नमः
ओं प्रमथाय नमः
ओं प्रथमाय नमः
ओं प्राज्ञाय नमः
ओं विघ्नकर्त्रे नमः
ओं विघ्नहंत्रे नमः
ओं विश्वनेत्रे नमः
ओं विराट्पतये नमः
ओं श्रीपतये नमः
ओं वाक्पतये नमः
ओं शृंगारिणे नमः
ओं आश्रितवत्सलाय नमः
ओं शिवप्रियाय नमः
ओं शीघ्रकारिणे नमः
ओं शाश्वताय नमः
ओं बलाय नमः
ओं बलोत्थिताय नमः
ओं भवात्मजाय नमः
ओं पुराणपुरुषाय नमः
ओं पूष्णे नमः
ओं पुष्करोत्क्षिप्तवारिणे नमः
ओं अग्रगण्याय नमः
ओं अग्रपूज्याय नमः
ओं अग्रगामिने नमः
ओं मंत्रकृते नमः
ओं चामीकरप्रभाय नमः
ओं सर्वस्मै नमः
ओं सर्वोपास्याय नमः
ओं सर्वकर्त्रे नमः
ओं सर्वनेत्रे नमः
ओं सर्वसिद्धिप्रदाय नमः
ओं सर्वसिद्धये नमः
ओं पंचहस्ताय नमः
ओं पार्वतीनंदनाय नमः
ओं प्रभवे नमः
ओं कुमारगुरवे नमः
ओं अक्षोभ्याय नमः
ओं कुंजरासुरभंजनाय नमः
ओं प्रमोदाय नमः
ओं मोदकप्रियाय नमः
ओं कांतिमते नमः
ओं धृतिमते नमः
ओं कामिने नमः
ओं कपित्थपनसप्रियाय नमः
ओं ब्रह्मचारिणे नमः
ओं ब्रह्मरूपिणे नमः
ओं ब्रह्मविद्यादिदानभुवे नमः
ओं जिष्णवे नमः
ओं विष्णुप्रियाय नमः
ओं भक्तजीविताय नमः
ओं जितमन्मथाय नमः
ओं ऐश्वर्यकारणाय नमः
ओं ज्यायसे नमः
ओं यक्षकिन्नरसेविताय नमः
ओं गंगासुताय नमः
ओं गणाधीशाय नमः
ओं गंभीरनिनदाय नमः
ओं वटवे नमः
ओं अभीष्टवरदाय नमः
ओं ज्योतिषे नमः
ओं भक्तनिधये नमः
ओं भावगम्याय नमः
ओं मंगळप्रदाय नमः
ओं अव्यक्ताय नमः
ओं अप्राकृतपराक्रमाय नमः
ओं सत्यधर्मिणे नमः
ओं सख्ये नमः
ओं सरसांबुनिधये नमः
ओं महेशाय नमः
ओं दिव्यांगाय नमः
ओं मणिकिंकिणीमेखलाय नमः
ओं समस्तदेवतामूर्तये नमः
ओं सहिष्णवे नमः
ओं सततोत्थिताय नमः
ओं विघातकारिणे नमः
ओं विश्वग्दृशे नमः
ओं विश्वरक्षाकृते नमः
ओं कळ्याणगुरवे नमः
ओं उन्मत्तवेषाय नमः
ओं अपराजिते नमः
ओं समस्तजगदाधाराय नमः
ओं सर्वैश्वर्यप्रदाय नमः
ओं आक्रांतचिदचित्प्रभवे नमः
ओं श्रीविघ्नेश्वराय नमः
क्यों मनाते हैं?
शिव पुराण कहता है कि पार्वती ने उबटन से एक बालक गढ़कर उसमें प्राण फूँके — बाद में उन्हें हाथी का सिर मिला और वे गणों के अधिपति बने। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी उनका जन्मदिन है।
शिव पुराण
'आज चाँद मत देखो, कलंक लगेगा' वाली बात स्यमंतक मणि की कथा से जुड़ी है — इसीलिए पूजा में वही कथा पढ़कर 'मिथ्या कलंक' से बचा जाता है। डरने के लिए नहीं, एक बढ़िया कहानी सुनने के लिए!
स्यमंतक कथा
कैसे मनाएँ?
- मिट्टी के गणेश सबसे अच्छे — पूजा के बाद पानी में घुल जाते हैं, प्रकृति पर बोझ नहीं बनते
- 21 तरह की पत्री चढ़ाइए — जितनी मिल जाए उतनी काफ़ी; गिनती से ज़्यादा भक्ति मायने रखती है
- उंड्रालु और कुडुमुलु (मोदक) का नैवेद्य
- स्यमंतक मणि की कथा पढ़िए
- विसर्जन — आना और मुस्कुराते हुए विदा लेना, दोनों सिखाने वाला त्योहार
हाथी के सिर वाले भगवान की सवारी है नन्हा चूहा! साइज़ नहीं, टीमवर्क मायने रखता है — यह पहला लेसन उन्हीं का दिया हुआ है।
छोटी बातें
- 🌺 पूजा के बाद — अपने घर की परंपरा के अनुसार जितने दिन विनायक को रखते हैं, उतने दिन प्रतिदिन सरलता से दीप, धूप, फूल, नैवेद्य और आरती कर सकते हैं।
- ♻️ फूल, पत्र और दूर्वा को खाद में बदल सकें तो वैसा कीजिए; अन्यथा गीले कचरे में डालिए।
- 🌊 “प्राकृतिक ही तो हैं” कहकर तालाबों, नहरों या नदियों में मत डालिए। फूल और पत्र प्राकृतिक होते हुए भी, बड़ी मात्रा में पानी में पड़ें तो सड़ते समय पानी की प्राणवायु घट जाती है। इससे मछलियों और अन्य जलचरों को साँस लेने में कठिनाई हो सकती है; पानी की गुणवत्ता घटती है; और फूलों के साथ लगा तेल, कुमकुम, रंग और धागा जलचरों को और अधिक हानि पहुँचा सकते हैं।
- 🌿 प्रकृति के अनुकूल होने का अर्थ “प्राकृतिक वस्तु को पानी में डालना” नहीं है — प्रकृति को हानि पहुँचाए बिना उसे वापस मिट्टी में मिलाना है। इसीलिए फूल, पत्र और दूर्वा को खाद में बदलना सबसे अच्छा है।
- 🍌 फल, नारियल और नैवेद्य प्रसाद के रूप में लीजिए और बाँटिए। सजावट को अगली पूजाओं में दोबारा उपयोग कीजिए।
- 🌊 विसर्जन — प्राकृतिक मिट्टी के विनायक हों तो, हो सके तो घर में ही बड़े पात्र में विसर्जन कर सकते हैं। विसर्जन के बाद वह जल पौधों में डाल सकते हैं। बाहर विसर्जन करें तो, विसर्जन के लिए बनाए गए कुंडों का ही उपयोग कीजिए। फूल, प्लास्टिक कवर, थर्मोकोल और वस्त्र की सजावट पानी में मत डालिए।
- ❤️ हमने विनायक को प्रेम से घर बुलाया। फूलों से पूजा की। नैवेद्य रखा। आरती दी। उन्हें विदा करते समय भी… उनकी सृष्टि को हानि न पहुँचे, इसका ध्यान रखें तो वही हमारी पूजा का और भी सुंदर समापन है। 🌿 विनायक की पूजा करें। विनायक की सृष्टि का भी सम्मान करें। 🙏 गणपति बप्पा मोरया!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विनायक चतुर्थी कब है?
2026 सितंबर 14, सोमवार.
विनायक चतुर्थी क्यों मनाते हैं?
शिव पुराण कहता है कि पार्वती ने उबटन से एक बालक गढ़कर उसमें प्राण फूँके — बाद में उन्हें हाथी का सिर मिला और वे गणों के अधिपति बने। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी उनका जन्मदिन है। (शिव पुराण)
विनायक चतुर्थी कैसे करें?
• मिट्टी के गणेश सबसे अच्छे — पूजा के बाद पानी में घुल जाते हैं, प्रकृति पर बोझ नहीं बनते • 21 तरह की पत्री चढ़ाइए — जितनी मिल जाए उतनी काफ़ी; गिनती से ज़्यादा भक्ति मायने रखती है • उंड्रालु और कुडुमुलु (मोदक) का नैवेद्य • स्यमंतक मणि की कथा पढ़िए • विसर्जन — आना और मुस्कुराते हुए विदा लेना, दोनों सिखाने वाला त्योहार
विनायक चतुर्थी — क्या-क्या चाहिए?
सूची में कुल 61 वस्तुएँ हैं, इन भागों में: नित्य पूजा सामग्री · विनायक और पूजा की चौकी · फूल • पत्र • फल और ताम्बूल · नैवेद्य के लिए · एकविंशति पत्र।
विनायक चतुर्थी — पूजा में कितना समय लगता है?
लगभग 60 मिनट — 17 चरण।