वरलक्ष्मी व्रत
वरलक्ष्मी माता · लगभग 38 मिनट · 17 चरण
कब है?
विधि — एक नज़र में
तिथियाँ हमारे अपने पंचांग इंजन की गणना हैं — टीटीडी श्रीवारी कैलेंडर से मिनट-दर-मिनट मेल खाती हैं।
यह घर की रीति की सरल वरलक्ष्मी पूजा है। हर सीढ़ी आपकी गति से चलती है — सुनिए, कीजिए; होने पर एक स्पर्श काफ़ी है।
शुक्रवार सुबह, स्नान के बाद। कुल लगभग एक घंटा।
पूरी विधि
सुबह की तैयारी
- सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
- पूजा स्थल साफ़ करें
- रंगोली बनाकर पूजा चौकी तैयार करें
- चौकी पर नया वस्त्र बिछाएं
- कलश की थाली में चावल रखकर तैयार करें
कलश की तैयारी
- कलश पर हल्दी, कुमकुम लगाएं
- कलश में जल भरें
- अक्षत, सिक्के, सुपारी आदि मंगल द्रव्य घर की रीति से डालें
- कलश के गले में हल्दी का धागा बांधें
- आम के पत्ते सजाएं
- हल्दी लगा नारियल ऊपर रखें
- वस्त्र · ब्लाउज़ पीस बांधें
- देवी का मुख हो तो लगाएं
- चावल की थाली पर कलश स्थापित करें

कलश के द्रव्य घर की परंपरा अनुसार बदल सकते हैं।
दीप जलाएं
- दीप जलाकर यह श्लोक पढ़ें
श्लोकशुक्लांबरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशांतये ॥
आचमन
- थोड़ा जल लेकर आचमन करें
श्लोकओं केशवाय नमः ओं नारायणाय नमः ओं माधवाय नमः
गणपति पूजा
- हल्दी गणपति या गणेश मूर्ति रखें
- हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूलों से पूजा करें
- नैवेद्य अर्पित करें
श्लोकवक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
हर शुभ कार्य का आरंभ गणेश पूजा से होता है।
संकल्प
- संकल्प कहें — देवी की कृपा, परिवार के क्षेम, आरोग्य, आयु और ऐश्वर्य के लिए व्रत कर रही हैं।
देवी का आवाहन
- ध्यान करते हुए कलश में वरलक्ष्मी देवी का आवाहन करें — देवी को विराजमान मानकर भक्ति से पूजा आरंभ करें।
- हल्दी, कुमकुम अर्पित करें
- चंदन अर्पित करें
- अक्षत अर्पित करें
- पुष्प अर्पित करें
- घर की रीति से वस्त्र, चूड़ियां, मंगल द्रव्य अर्पित करें
अंगपूजा और अष्टोत्तर
- फूल · अक्षत से अंगपूजा करें
- अष्टोत्तर शतनामावली पढ़ते या सुनते हुए फूल या अक्षत अर्पित करें
स्वर्ण रूप पूजावैकल्पिक
- घर में जो भी एक स्वर्ण वस्तु हो, देवी के पास रखें
- न हो तो हल्दी की गांठ, एक सिक्का या एक पान का पत्ता — वही काफ़ी है
- हल्दी, कुमकुम, फूलों से पूजा करें
यह सीढ़ी वैकल्पिक है। सोना न हो तो व्रत में कोई कमी नहीं — देवी भक्ति देखती हैं, सोना नहीं।
क्या आप जानती हैं?
बड़े कहते हैं — सोना शक्ति को थामे रखता है। प्रतिष्ठित अम्मावारु से आती कांति को अपने में लेकर साल भर हमारे घर में ही रखता है। और एक प्यारी बात भी है — हमारे पास जो सोना है, वह अम्मा की कृपा ही तो है। उन्हीं का दिया उन्हीं के चरणों में रखकर, अम्मा यह सब आपसे ही है कहना — यही हमारी सनातन रीति की असली सुंदरता है।
डोरा पूजा
- डोरे की 9 गांठों की एक-एक नाम से पूजा होती है — हर गांठ पर फूल या अक्षत अर्पित करते हुए पढ़ें:
श्लोकओं कमलायै नमः — प्रथमग्रंथिं पूजयामि ओं रमायै नमः — द्वितीयग्रंथिं पूजयामि ओं लोकमात्रे नमः — तृतीयग्रंथिं पूजयामि ओं विश्वजनन्यै नमः — चतुर्थग्रंथिं पूजयामि ओं महालक्ष्म्यै नमः — पंचमग्रंथिं पूजयामि ओं क्षीराब्धितनयायै नमः — षष्ठग्रंथिं पूजयामि ओं विश्वसाक्षिण्यै नमः — सप्तमग्रंथिं पूजयामि ओं चंद्रसहोदर्यै नमः — अष्टमग्रंथिं पूजयामि ओं हरिवल्लभायै नमः — नवमग्रंथिं पूजयामि
9 गांठों की पूजा के बाद घर की रीति से डोरा कलाई पर बांधें।
व्रत कथा
- व्रत कथा पढ़ें या सुनें
- कथा के बाद देवी को प्रणाम करें
नैवेद्य अर्पण
- बनाए नैवेद्य देवी के सामने रखकर भक्ति से अर्पित करें
श्लोकओं महालक्ष्मी देव्यै नमः — नैवेद्यं समर्पयामि
देवी को वायनम् · तांबूल
- तैयार वायनम् · तांबूल देवी को अर्पित करें
श्लोकओं महालक्ष्मी देव्यै नमः — तांबूलं समर्पयामि
धूप, दीप और आरती
- पुष्प अर्पित करें
- ओं महालक्ष्म्यै नमः — पुष्पं समर्पयामि
- धूप दिखाएं
- ओं महालक्ष्म्यै नमः — धूपं समर्पयामि
- दीप दिखाएं
- ओं महालक्ष्म्यै नमः — दीपं समर्पयामि
- कपूर आरती दें
- ओं महालक्ष्म्यै नमः — हारति समर्पयामि
- पूरा परिवार देवी को प्रणाम करे
सुहागिनों को तांबूल
- पूजा के बाद सुहागिनों को तांबूल देकर आशीर्वाद लें
प्रसाद
- देवी का प्रसाद परिवार, रिश्तेदारों और सुहागिनों में बांटें
पूजा के बाद
- कलश कब हटाएं, नारियल और कलश-जल का उपयोग — ये परिवार और क्षेत्र अनुसार बदलते हैं।
- आपके घर की पीढ़ियों की परंपरा ही सर्वोपरि है।
पूजा सामग्री सूची
🪔 नित्य पूजा सामग्री
- हल्दी
- कुमकुम
- चंदन
- अक्षत
- कपूर
- अगरबत्ती · धूप
- बत्तियां
- घी · दीपक का तेल
- दीपक · प्रमिदा
- दीपक रखने की प्लेट
- घंटी
- पंचपात्र · उद्धरिणी
- आरती की थाली
- पूजा जल पात्र
- नैवेद्य की कटोरियां
घर की नित्य पूजा की सामग्री — अवश्य खरीदें।
🌸 फूल · फल · पत्ते
- फूल
- फूलों की माला
- पान के पत्ते — 15–25
- सुपारी
- आम के पत्ते
- तुलसी · पवित्र पत्ते
- नारियल — 2–3
- केले
- अन्य फल — 4–5 प्रकार
🪙 व्रत के लिए विशेष
- लक्ष्मी जी की फोटो · छोटी मूर्ति
- सोने का सिक्का · रूप — न हो तो हल्दी की गांठ या सिक्का काफ़ी है
- धागा
🛕 पूजा चौकी
- पूजा चौकी
- चौकी पर बिछाने का नया वस्त्र
- कलश के नीचे रखने के चावल
- रंगोली के लिए चावल का आटा
- हल्दी–कुमकुम–चंदन–अक्षत के लिए छोटी प्लेटें
- कलश रखने की थाली
🪷 वरलक्ष्मी कलश
- कलश — चांदी · तांबा · पीतल
- कलश में: जल, अक्षत, सिक्के, सुपारी, हल्दी — घर की परंपरा अनुसार
- आम के पत्ते — 5 या अधिक
- कलश पर रखने का नारियल
- कलश पर बांधने का हल्दी धागा
- फूल · माला
- नारियल के लिए नया वस्त्र · ब्लाउज़ पीस
✨ श्रृंगार
- वरलक्ष्मी जी का मुख
- देवी के लिए छोटी साड़ी · वस्त्र
- छोटे गहने · श्रृंगार सामग्री
- काले मोती · मंगलसूत्र
- चूड़ियां
- वेणी · फूलों का श्रृंगार
यह सब वैकल्पिक है — घर में जो है उसी से सुंदर श्रृंगार पर्याप्त है।
🧵 तोरम (डोरा)
- व्रत डोरा — हल्दी लगा 9 धागों का सूत्र, 9 गांठें
- डोरे पर बांधने के फूल
- सोने का रूप डोरे में पिरोना
🎁 देवी का वायनम्
- पान के पत्ते
- सुपारी
- हल्दी · कुमकुम
- फल
- फूल
- चूड़ियां
- साड़ी, ब्लाउज़ पीस
- दक्षिणा
घर की परंपरा हो तो छोटा दर्पण, कंघी और काजल भी रखते हैं।
👩🦳 सुहागिनों का तांबूल
- पान के पत्ते
- सुपारी
- हल्दी · कुमकुम
- फल
- चूड़ियां
- फूल
- ब्लाउज़ पीस
- प्रसाद
🍚 नैवेद्य
- पुलिहोरा
- परमान्न · खीर
- बूरेलु (पूरण)
- गारेलु (वड़े)
- चलिमिडि
- भीगी मूंग दाल
- पानकम
- दही चावल
- फल
- नारियल
- गुड़
- प्रसाद के लिए केले के पत्ते · प्लेटें
सब बनाना ज़रूरी नहीं। परिवार की परंपरा अनुसार 2–4 मुख्य नैवेद्य पर्याप्त हैं।
📿 पूजा के समय
- गणेश मूर्ति · हल्दी गणपति के लिए हल्दी
- वरलक्ष्मी व्रत कथा (इसी ऐप में 📖 में)
- अष्टोत्तर शतनामावली
- लक्ष्मी स्तोत्र
🏠 एक दिन पहले
- घर और पूजा स्थल की सफाई
- पूजा सामग्री एक जगह रखना
- कलश, दीपक, चांदी की चीज़ें साफ़ करना
- नैवेद्य का सामान तैयार — दालें, चावल, गुड़, घी
- काले चने, दालें भिगोना
- देवी के श्रृंगार की योजना पहले से
- तांबूल पहले से तैयार रखना
📖 व्रत कथा
प्राचीन काल में सूत महर्षि ने शौनकादि मुनियों से कहा: हे मुनियों! स्त्रियों को सौभाग्य देने वाला एक व्रत स्वयं परम शिव ने पार्वती देवी को बताया। लोक-कल्याण के लिए वही व्रत मैं आपको सुनाता हूं — श्रद्धा से सुनिए।
एक दिन परमेश्वर अपने सिंहासन पर विराजमान थे। पार्वती देवी ने पूछा: "नाथ! ऐसा व्रत बताइए जिससे स्त्रियां सब सुख पाएं, पुत्र-पौत्रों से बढ़ें और मोक्ष पाएं।" शिव जी बोले: "देवी! स्त्रियों को सकल शुभ देने वाला एक व्रत है — वही वरलक्ष्मी व्रत।"
यह व्रत श्रावण मास की पूर्णिमा से पहले आने वाले शुक्रवार को करना चाहिए — ऐसा उन्होंने बताया।
तब पार्वती देवी ने पूछा: "देव! यह व्रत सबसे पहले किसने किया? विस्तार से बताइए।" "कात्यायनी! पूर्वकाल में मगध देश में कुंडिन नाम का नगर था। वहां चारुमती नाम की एक स्त्री रहती थी — गुणवती, विनयशील, भक्ति-भाव वाली। वह प्रतिदिन प्रातः उठकर पति और सास-ससुर की सेवा करती और पड़ोसियों से मिलजुल कर रहती।"
एक रात वरलक्ष्मी देवी चारुमती के स्वप्न में प्रकट हुईं: "चारुमती! श्रावण पूर्णिमा से पहले के शुक्रवार को मेरी पूजा करो — तुम्हारे मांगे वर और उपहार दूंगी" — कहकर अंतर्धान हो गईं। चारुमती आनंदित होकर बोली: "हे जननी! जिन पर आपकी कृपा-दृष्टि है वे धन्य हैं। हे पावनी! पूर्वजन्म के पुण्य से मुझे आपके दर्शन हुए" — इस प्रकार अनेक विध स्तुति की।
जागने पर चारुमती ने उसे स्वप्न जाना और पति तथा सास-ससुर को बताया। वे बहुत प्रसन्न हुए और व्रत करने को कहा। नगर की स्त्रियां भी स्वप्न की बात सुनकर उस शुभ शुक्रवार की प्रतीक्षा करने लगीं।
श्रावण शुक्रवार के दिन नगर की सब स्त्रियां भोर में उठीं, स्नान कर रेशमी वस्त्र पहनकर चारुमती के घर पहुंचीं। चारुमती ने घर में मंडप बनाकर उस पर चावल बिछाए, कलश स्थापित किया, संकल्प के साथ वरलक्ष्मी देवी का आवाहन कर प्रतिष्ठा की। षोडशोपचार से पूजा कर नैवेद्य अर्पित किए। नौ धागों का डोरा हाथ में बांधकर प्रदक्षिणा-नमस्कार किए।
पहली प्रदक्षिणा करते ही पैरों में पायल छन-छन बज उठीं। दूसरी करते ही हाथों में नवरत्न-जड़े कंगन दमक उठे। तीसरी करते ही सब स्त्रियां सर्वाभूषणों से सज गईं।
उस व्रत के फल से चारुमती के घर सहित नगर की सब स्त्रियों के घर धन-धान्य, स्वर्ण और वाहनों से भर गए। उनके घरों से हाथी-घोड़े-रथ आकर उन्हें ले गए। मार्ग भर वे चारुमती की प्रशंसा करती रहीं — देवी ने उसके स्वप्न में आकर अनुग्रह किया और उसके व्रत ने सबको महाभाग्यवान बना दिया। तब से वे प्रतिवर्ष वरलक्ष्मी व्रत करके सुख-समृद्धि से जीवन बिताकर मुक्ति को प्राप्त हुईं।
हे मुनियों! शिव जी ने पार्वती जी को जो वरलक्ष्मी व्रत विधि बताई, वही मैंने आपको सुनाई। यह कथा सुनने से, व्रत करने से, या करते हुए देखने मात्र से भी सकल सौभाग्य, धन-संपदा और आयु-आरोग्य-ऐश्वर्य सिद्ध होते हैं — ऐसा सूत महामुनि ने शौनकादि महर्षियों से कहा।
कथा सुनकर अक्षत लक्ष्मी जी के चरणों में और अपने सिर पर रखें। फिर सुहागिनों को तांबूल दें, सबको तीर्थ-प्रसाद बांटें — पूजा करने वाले भी उन्हें लें। यह व्रत किसी भी कुल-परंपरा के लोग कर सकते हैं। भक्ति से मांगने पर वर देने वाली मां हैं वरलक्ष्मी देवी।
अष्टोत्तर शतनामावली
पूरी नामावली पढ़िए (109)
ओं प्रकृत्यै नमः
ओं विकृत्यै नमः
ओं विद्यायै नमः
ओं सर्वभूत हितप्रदायै नमः
ओं श्रद्धायै नमः
ओं विभूत्यै नमः
ओं सुरभ्यै नमः
ओं परमात्मिकायै नमः
ओं वाचे नमः
ओं पद्मालयायै नमः (10)
ओं पद्मायै नमः
ओं शुचये नमः
ओं स्वाहायै नमः
ओं स्वधायै नमः
ओं सुधायै नमः
ओं धन्यायै नमः
ओं हिरण्मय्यै नमः
ओं लक्ष्म्यै नमः
ओं नित्यपुष्टायै नमः
ओं विभावर्यै नमः (20)
ओं अदित्यै नमः
ओं दित्यै नमः
ओं दीप्तायै नमः
ओं वसुधायै नमः
ओं वसुधारिण्यै नमः
ओं कमलायै नमः
ओं कांतायै नमः
ओं कामाक्ष्यै नमः
ओं क्षीरोदसंभवायै नमः
ओं अनुग्रहपरायै नमः (30)
ओं बुद्धये नमः
ओं अनघायै नमः
ओं हरिवल्लभायै नमः
ओं अशोकायै नमः
ओं अमृतायै नमः
ओं दीप्तायै नमः
ओं लोकशोक विनाशिन्यै नमः
ओं धर्मनिलयायै नमः
ओं करुणायै नमः
ओं लोकमात्रे नमः (40)
ओं पद्मप्रियायै नमः
ओं पद्महस्तायै नमः
ओं पद्माक्ष्यै नमः
ओं पद्मसुंदर्यै नमः
ओं पद्मोद्भवायै नमः
ओं पद्ममुख्यै नमः
ओं पद्मनाभप्रियायै नमः
ओं रमायै नमः
ओं पद्ममालाधरायै नमः
ओं देव्यै नमः (50)
ओं पद्मिन्यै नमः
ओं पद्मगंधिन्यै नमः
ओं पुण्यगंधायै नमः
ओं सुप्रसन्नायै नमः
ओं प्रसादाभिमुख्यै नमः
ओं प्रभायै नमः
ओं चंद्रवदनायै नमः
ओं चंद्रायै नमः
ओं चंद्रसहोदर्यै नमः
ओं चतुर्भुजायै नमः (60)
ओं चंद्ररूपायै नमः
ओं इंदिरायै नमः
ओं इंदुशीतलायै नमः
ओं आह्लादजनन्यै नमः
ओं पुष्ट्यै नमः
ओं शिवायै नमः
ओं शिवकर्यै नमः
ओं सत्यै नमः
ओं विमलायै नमः
ओं विश्वजनन्यै नमः (70)
ओं तुष्टये नमः
ओं दारिद्र्यनाशिन्यै नमः
ओं प्रीतिपुष्करिण्यै नमः
ओं शांतायै नमः
ओं शुक्लमाल्यांबरायै नमः
ओं श्रियै नमः
ओं भास्कर्यै नमः
ओं बिल्वनिलयायै नमः
ओं वरारोहायै नमः
ओं यशस्विन्यै नमः (80)
ओं वसुंधरायै नमः
ओं उदारांगायै नमः
ओं हरिण्यै नमः
ओं हेममालिन्यै नमः
ओं धनधान्य कर्यै नमः
ओं सिद्धये नमः
ओं स्त्रैणसौम्यायै नमः
ओं शुभप्रदायै नमः
ओं नृपवेश्मगतायै नमः
ओं नंदायै नमः (90)
ओं वरलक्ष्म्यै नमः
ओं वसुप्रदायै नमः
ओं शुभायै नमः
ओं हिरण्यप्राकारायै नमः
ओं समुद्र तनयायै नमः
ओं जयायै नमः
ओं मंगळायै देव्यै नमः
ओं विष्णु वक्षःस्थल स्थितायै नमः
ओं विष्णुपत्न्यै नमः
ओं प्रसन्नाक्ष्यै नमः (100)
ओं नारायण समाश्रितायै नमः
ओं दारिद्र्य ध्वंसिन्यै नमः
ओं सर्वोपद्रव वारिण्यै नमः
ओं नवदुर्गायै नमः
ओं महाकाळ्यै नमः
ओं ब्रह्म विष्णु शिवात्मिकायै नमः
ओं त्रिकाल ज्ञान संपन्नायै नमः
ओं भुवनेश्वर्यै नमः (108)
इति श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावळि समाप्तम्.
क्यों मनाते हैं?
स्कंद पुराण की कथा है कि चारुमती नाम की भक्त स्त्री के सपने में वरलक्ष्मी आईं और उन्होंने श्रावण के शुक्रवार को अपनी पूजा करने को कहा — यह व्रत खुद शिव जी ने पार्वती को सुनाया था।
स्कंद पुराण
'वर देने वाली लक्ष्मी' इसलिए वरलक्ष्मी। तेलुगु घरों में पीढ़ियों से यह विश्वास है कि इस एक पूजा से आठों लक्ष्मियों का आशीर्वाद मिल जाता है।
तेलुगु परंपरा
कैसे मनाएँ?
- कलश रखकर देवी का स्वागत कीजिए — नारियल और ब्लाउज़ के कपड़े के साथ
- तोरम बाँधिए — नौ गाँठों वाला हल्दी का धागा
- पुलिहोरा और पूर्णम बूरेलु का नैवेद्य
- सुहागिनों को बुलाकर तांबूलम दीजिए
- याद रखिए: भक्ति ज़रूरी है, ठाट-बाट नहीं। छोटी-सी पूजा भी मन से हो तो पूरी है
इस पूरे त्योहार का असली हीरो है एक सपना! चारुमती को आया एक सपना सैकड़ों सालों का त्योहार बन गया। अपने सपनों को कभी कम मत आँकिए!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वरलक्ष्मी व्रत कब है?
2027 अगस्त 13, शुक्रवार.
वरलक्ष्मी व्रत क्यों मनाते हैं?
स्कंद पुराण की कथा है कि चारुमती नाम की भक्त स्त्री के सपने में वरलक्ष्मी आईं और उन्होंने श्रावण के शुक्रवार को अपनी पूजा करने को कहा — यह व्रत खुद शिव जी ने पार्वती को सुनाया था। (स्कंद पुराण)
वरलक्ष्मी व्रत कैसे करें?
• कलश रखकर देवी का स्वागत कीजिए — नारियल और ब्लाउज़ के कपड़े के साथ • तोरम बाँधिए — नौ गाँठों वाला हल्दी का धागा • पुलिहोरा और पूर्णम बूरेलु का नैवेद्य • सुहागिनों को बुलाकर तांबूलम दीजिए • याद रखिए: भक्ति ज़रूरी है, ठाट-बाट नहीं। छोटी-सी पूजा भी मन से हो तो पूरी है
वरलक्ष्मी व्रत — क्या-क्या चाहिए?
सूची में कुल 88 वस्तुएँ हैं, इन भागों में: नित्य पूजा सामग्री · फूल · फल · पत्ते · व्रत के लिए विशेष · पूजा चौकी · वरलक्ष्मी कलश · श्रृंगार · तोरम (डोरा) · देवी का वायनम् · सुहागिनों का तांबूल · नैवेद्य · पूजा के समय · एक दिन पहले।
वरलक्ष्मी व्रत — पूजा में कितना समय लगता है?
लगभग 38 मिनट — 17 चरण।